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संचार के मॉडल (Models of Communication) → Concept and Theories

Published by: Ravi Kumar
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प्रस्तावना (Introduction)

संचार एक जटिल प्रक्रिया है जिसे आसानी से समझने के लिए विद्वानों ने विभिन्न ‘मॉडलों’ या प्रतिरूपों का निर्माण किया है। एक संचार मॉडल (Communication Model) संचार प्रक्रिया का एक दृश्य निरूपण (Visual Representation) है। जिस प्रकार एक आर्किटेक्ट इमारत बनाने से पहले उसका नक्शा (Map/Model) बनाता है, उसी प्रकार संचार शास्त्री (Communication Theorists) संचार की प्रक्रिया, उसके तत्वों और उनके बीच के संबंधों को समझाने के लिए मॉडल का उपयोग करते हैं।

मोर्टेंसन (Mortensen) के अनुसार, “संचार मॉडल किसी वास्तविक दुनिया की घटना का एक व्यवस्थित प्रतिनिधित्व है।” यह हमें यह समझने में मदद करता है कि ‘कौन’, ‘किससे’, ‘क्या’ और ‘कैसे’ कह रहा है। संचार के मॉडलों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:

  1. रेखीय मॉडल (Linear Models): एकतरफा संचार (One-way communication)।
  2. इंटरैक्टिव मॉडल (Interactive Models): द्विमार्गी संचार (Two-way communication) जिसमें फीडबैक शामिल है।
  3. ट्रांजेक्शनल मॉडल (Transactional Models): जहाँ प्रेषक और प्राप्तकर्ता एक साथ संदेश भेजते और प्राप्त करते हैं।

अरस्तू का संचार मॉडल (Aristotle’s Model of Communication)

यह संचार का सबसे पुराना और शास्त्रीय मॉडल (Classical Model) है, जो लगभग 300 ईसा पूर्व में विकसित किया गया था। यह मॉडल मुख्य रूप से सार्वजनिक भाषण (Public Speaking) या वक्तृत्व कला (Rhetoric) पर केंद्रित है।

  • प्रकृति (Nature): यह एक रेखीय (Linear) मॉडल है। इसमें कोई फीडबैक नहीं होता।
  • मुख्य तत्व (Key Elements): अरस्तू ने संचार के 5 मुख्य तत्व बताए, लेकिन यह 3 स्तंभों पर टिका है:
    1. वक्ता (Speaker): सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति जो भाषण देता है।
    2. भाषण/संदेश (Speech): जो कहा जा रहा है।
    3. श्रोता (Audience): जो सुन रहा है।
  • यह मॉडल वक्ता-केंद्रित (Speaker-centric) है। इसमें वक्ता की भूमिका सबसे प्रमुख होती है और श्रोता निष्क्रिय (Passive) होते हैं।
  • इसका उद्देश्य श्रोताओं को प्रभावित करना (To persuade) है।
  • उदाहरण: एक नेता द्वारा चुनावी रैली में दिया गया भाषण।

लासवेल का मॉडल (Lasswell’s Model, 1948)

हेराल्ड डी. लासवेल (Harold D. Lasswell) ने जनसंचार (Mass Communication) को समझाने के लिए यह मॉडल दिया। यह भी एक रेखीय मॉडल है, लेकिन यह अरस्तू से अधिक विस्तृत है। इसे “5 Ws Model” भी कहा जाता है क्योंकि यह पाँच प्रश्नों पर आधारित है।

  1. Who (कौन) → प्रेषक (Sender)
  2. Says What (क्या कहता है) → संदेश (Message)
  3. In Which Channel (किस माध्यम में) → माध्यम (Channel/Medium)
  4. To Whom (किससे) → प्राप्तकर्ता/श्रोता (Receiver)
  5. With What Effect (किस प्रभाव के साथ) → प्रभाव (Effect)
  • यह मॉडल ‘प्रभाव’ (Effect) पर बहुत जोर देता है। यानी संचार का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि प्राप्तकर्ता के व्यवहार में बदलाव लाना है।
  • कमी: इसमें भी ‘फीडबैक’ (Feedback) और ‘शोर’ (Noise) की अवधारणा गायब है।

शैनन और वीवर का मॉडल (Shannon and Weaver’s Model, 1949)

इसे संचार का “गणितीय मॉडल” (Mathematical Model) या “इंजीनियरिंग मॉडल” कहा जाता है। क्लाउड शैनन और वारेन वीवर ने इसे टेलीफोन संचार की तकनीकी समस्याओं को समझने के लिए विकसित किया था, लेकिन बाद में इसे मानव संचार पर भी लागू किया गया।

  1. सूचना स्रोत (Information Source): जो संदेश बनाता है।
  2. ट्रांसमीटर/एनकोडर (Transmitter): जो संदेश को संकेतों (Signals) में बदलता है (जैसे टेलीफोन का माउथपीस)।
  3. चैनल (Channel): वह माध्यम जिससे संकेत यात्रा करते हैं (जैसे तार या हवा)।
  4. शोर (Noise): यह इस मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। शोर वह बाधा है जो संदेश को विकृत (Distort) कर देती है।
  5. रिसीवर/डिकोडर (Receiver): जो संकेतों को वापस संदेश में बदलता है।
  6. गंतव्य (Destination): जिसके लिए संदेश भेजा गया था।
  • इसने पहली बार संचार में ‘शोर’ (Noise) की अवधारणा को पेश किया।
  • यह भी एक रेखीय (Linear) मॉडल है, हालांकि बाद में इसमें फीडबैक को जोड़ा गया।

बर्लो का SMCR मॉडल (Berlo’s SMCR Model, 1960)

डेविड बर्लो (David Berlo) ने शैनन-वीवर के मॉडल को मानवीय रूप दिया। उन्होंने संचार को एक प्रक्रिया के रूप में समझाया जिसमें चार मुख्य घटक होते हैं: S-M-C-R

  1. S – Source (स्रोत/प्रेषक): संदेश भेजने वाला। उसकी संचार कौशल (Comm. Skills), दृष्टिकोण (Attitude), ज्ञान (Knowledge), और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रणाली (Social System) संचार को प्रभावित करती है।
  2. M – Message (संदेश): इसमें विषय वस्तु (Content), तत्व (Elements), उपचार (Treatment), संरचना (Structure) और कोड (Code) शामिल हैं।
  3. C – Channel (माध्यम): बर्लो ने 5 इंद्रियों (Five Senses) को चैनल माना है: देखना (Seeing), सुनना (Hearing), छूना (Touching), सूंघना (Smelling), और चखना (Tasting)।
  4. R – Receiver (प्राप्तकर्ता): संदेश प्राप्त करने वाला। प्रभावी संचार के लिए प्रेषक और प्राप्तकर्ता का स्तर (Level) समान होना चाहिए।

कमी: इस मॉडल में भी फीडबैक की कमी है, जो इसे एकतरफा बनाता है।

विल्बर श्रैम का मॉडल (Wilbur Schramm’s Model, 1954)

श्रैम का मॉडल संचार की समझ में एक बड़ा बदलाव लाया। उन्होंने संचार को एक चक्रीय प्रक्रिया (Circular Process) माना।

मुख्य विशेषताएं:

  1. एनकोडिंग और डिकोडिंग (Encoding and Decoding): श्रैम के अनुसार, प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों ही एनकोडर और डिकोडर का काम करते हैं।
  2. अनुभव का क्षेत्र (Field of Experience): यह इस मॉडल की सबसे बड़ी देन है। ‘अनुभव का क्षेत्र’ का अर्थ है व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक फ्रेम (संस्कृति, ज्ञान, पृष्ठभूमि)।
    • नियम: प्रेषक और प्राप्तकर्ता के ‘अनुभव के क्षेत्र’ जितना अधिक ओवरलैप (Overlap) करेंगे, संचार उतना ही प्रभावी होगा। यदि दोनों के अनुभव पूरी तरह अलग हैं, तो संचार नहीं हो सकता।

उदाहरण: यदि एक प्रोफेसर (उच्च ज्ञान का क्षेत्र) एक पहली कक्षा के छात्र (सीमित ज्ञान का क्षेत्र) को क्वांटम फिजिक्स समझाए, तो ‘अनुभव का क्षेत्र’ न मिलने के कारण संचार विफल हो जाएगा।

ट्रांजेक्शनल मॉडल (Transactional Model)

यह आधुनिक संचार का सबसे विकसित रूप है। डीन बार्नलुंड (Dean Barnlund) ने 1970 में इसे प्रस्तुत किया।

  • अवधारणा: संचार एकतरफा या बारी-बारी से (Turn-by-turn) होने वाली प्रक्रिया नहीं है। वास्तविक जीवन में, हम एक ही समय में प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों होते हैं।
  • सतत प्रक्रिया (Continuous Process): जब हम किसी की बात सुन रहे होते हैं (Receiver), तब भी हम अपने चेहरे के हाव-भाव से संदेश भेज रहे होते हैं (Sender)।
  • परिवेश (Context): यह मॉडल सामाजिक (Social), सांस्कृतिक (Cultural) और संबंधपरक (Relational) संदर्भों को बहुत महत्व देता है।

तुलनात्मक निष्कर्ष (Comparative Conclusion)

विशेषतारेखीय मॉडल (Linear)इंटरैक्टिव मॉडल (Interactive)ट्रांजेक्शनल मॉडल (Transactional)
दिशाएकतरफा (One-way)द्विमार्गी (Two-way)बहुआयामी/सर्पिल (Multi-directional)
फीडबैकअनुपस्थितउपस्थितसतत (Continuous)
भूमिकाप्रेषक सक्रिय, श्रोता निष्क्रियदोनों बारी-बारी से सक्रियदोनों एक साथ सक्रिय
उदाहरणटीवी समाचार, भाषणटेलीफोन पर बातआमने-सामने की चर्चा

निष्कर्ष: संचार के मॉडल मानव इतिहास में संचार के विकास को दर्शाते हैं। अरस्तू के सरल ‘वक्ता-श्रोता’ मॉडल से लेकर बार्नलुंड के जटिल ‘ट्रांजेक्शनल’ मॉडल तक की यात्रा यह बताती है कि संचार केवल सूचना देना नहीं, बल्कि अर्थ का निर्माण (Creation of Meaning) करना है। परीक्षा के दृष्टिकोण से, शैनन-वीवर (तकनीकी पक्ष के लिए) और बर्लो (मानवीय पक्ष के लिए) सबसे महत्वपूर्ण मॉडल हैं। एक प्रभावी प्रशासक को स्थिति के अनुसार इन मॉडलों का ज्ञान होना चाहिए ताकि वह संचार की बाधाओं (Noise) को कम कर सके।

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Ravi Kumar is a content creator at Sarkari Diary, dedicated to providing clear and helpful study material for B.Ed students across India.

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