विज्ञान सीखने की प्रक्रिया

किसी भी विषय, बिन्दु अथवा पाठ को पढ़ने से पहले यह ज्ञात होना आवश्यक होता है कि इस विषय, बिन्दु अथवा पाठ का उद्देश्य क्या है व यह विद्यार्थियों को क्यों पढ़ाया जाए। यह एक सामान्य प्रश्न है जिसका उत्तर एक शिक्षक के पास होना अत्यन्त ही आवश्यक है। यह मात्र एक प्रश्न नहीं है, यह एक मार्ग है जो विषय से सम्बन्धित कई सारे पहलुओं को अपने में समेटे होता है। कक्षा में क्या पढ़ाना है, क्यों पढ़ाना है व कैसे पढ़ाना है, कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर यदि एक कक्षा में जाने से पहले यदि शिक्षक के पास मौजूद है तो वह नीरस से नीरस व कठिन से कठिन विषय को भी रोचक ढंग से प्रस्तुत कर सकता है। कक्षा में जाने से पूर्व शिक्षण बिन्द की पूर्ण समझ कक्षा-कक्ष में इसके प्रभावी शिक्षण के लिए सहयोगी है। इसे इस प्रकार देखा जा सकता है, उदाहरण के लिए यदि एक शिक्षक कक्षा में जाकर कोशिका के बारे में शिक्षण कराना चाहता है तो इस विषय के बारे पूर्व जानकारी कक्षा के स्तर, आवश्यकता, विषय वस्तु का स्तर इत्यादि निर्धारित करती है। यदि शिक्षक कोशिका पढ़ाने के उद्देश्य से परिचित नहीं है, विषय की आवश्यकता का ध्यान नहीं है तो इस दशा में वह न तो शिक्षण के स्तर का ध्यान रख पाएगा न ही शिक्षण पद्धति का। इस दशा में विद्यार्थियों को विषय समझने में कठिनाई होगी और यह भी सम्भव है कि वे विषय को समझ ही न पाएँ।

इसी क्रम में यदि विषय को पूर्व ज्ञान के साथ जोड़कर देखा जाए तो यह बच्चों कि समझ वृद्धि में एक उपयोगी प्रयास हो सकता है। किसी कार्य को शून्य से प्रारम्भ करना अथवा पूर्व में निहित ज्ञान के आधार पर ज्ञान में वृद्धि करना दो अलग-अलग मार्ग हैं। विभिन्न शिक्षाविदों का मानना है कि बच्चा अपने जीवन में घटित हो रही प्रत्येक घटना अथवा गतिविधि से सीख रहा होता है, अतः पूर्व की यह धारणा कि बच्चे कोरा कागज होते हैं या मिट्टी के घड़े होते हैं व इन्हें किसी भी रूप में ढाला जा सकता है जैसी मान्यताएँ अब कमजोर हो गई हैं। बच्चा विद्यालय में आने से पहले से बहुत कुछ जानता है व विद्यालय में आने के बाद यदि बच्चे के इस ज्ञान का प्रयोग उसे ओर अधिक सीखने में किया जाता है तो यह बच्चा व शिक्षक दोनों के लिए एक उपयोगी चरण होता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह विषय कि पुनरावृति को रोकता है जिससे विषय में रोचकता आती है। सीखे हुए ज्ञान से सीखना ज्ञान को एक मजबूत आधार देता है जो कि ज्ञान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

शिक्षक एवं विद्यार्थी की विषय पर पूर्व तैयारी एवं पूर्व ज्ञान के अतिरिक्त कुछ अन्य विषय भी हैं जिन्हें कक्षा प्रक्रियाओं के अन्तर्गत शामिल किया जाना जरूरी है और वे हैं तुलना करना व उपयोग करना। ज्ञान किसी भी विषय को ज्यों का त्यों याद कर लेना या पढ़ लेना मात्र नहीं, बल्कि इसका उपयोग अपने दैनिक जीवन में करना है। पूर्व में अध्ययन की गई जानकारी के आधार पर समस्या का निर्धारण, तुलना व ज्ञान के आधार पर उपाय करना ही ज्ञान का सही उपयोग है। यह बच्चों को पुस्तक की सहायता से परोसना सम्भव नहीं है, ये वे गुण हैं जो नियमित प्रयास के साथ व्यवहार में आते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षण को दैनिक जीवन व चारों ओर के पर्यावरण व दैनिक गतिविधियों से जोड़ते हुए कराया जाए। विभिन्न गतिविधियों के द्वारा किया गया यह नियमित प्रयास ज्ञान के सही उपयोग को सुनिश्चित करता है। इसी प्रकार अन्य कई ऐसे उद्देश्य हैं जो पाठ्य-पुस्तक में दृष्टिगोचर नहीं होते किन्तु विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से पाठ्य-पुस्तक से निकलकर आते हैं जिन्हें पाठ्यक्रम के अन्तर्निहित गुण कहा जाता है। ये वे गुण हैं जो नियमित प्रयास व व्यावहारिक ज्ञान से प्राप्त होते हैं।

गतिविधिः मोमबत्ती का अवलोकन

माइकल फैराडे प्रयोगशाला में कार्य करने के अलावा विद्यार्थियों को पढ़ाया भी करते थे। फैराडे ने मोमबत्ती (उस समय प्रकाश बत्ती) पर साठ अवलोकन किए थे। यह उदाहरण जिससे कि हम यह देख सकें कि एक सामान्य, दैनिक जीवन से जुड़े कार्य को किस हद तक गहराई से देखा व अनुभव किया जा सकता है। फैराडे ने भिन्न-भिन्न समय पर विद्यार्थियों से विज्ञान विषय पर चर्चा की, जिसमें प्रयोग से सम्बन्धित बिन्दुओं जैसे मोम के पूर्व स्वरुप व अब के स्वरूप पर भी चर्चा करते थे। इस चर्चा में वे प्रकाशबत्ती के इतिहास को भी शामिल किया करते थे। इसे हम ज्ञान के विकास के रूप में देख सकते हैं। किसी भी विषय के नवीन ज्ञान के सृजन से पूर्व उसकी पूर्व जानकारी आवश्यक है जो की आगे किए जाने वाले कार्यों का मार्ग प्रशस्त करती है।


i. बिना जलाए मोमबत्ती का अवलोकन

ii. जलाकर क्या परिवर्तन आते हैं

iii. बुझाने पर क्या परिवर्तन होते हैं

तीनों परिस्थितियों में प्राप्त अवलोकन निम्न प्रकार हो सकते हैं:

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